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शाहिद-ईशान की नानी खदीजा अजीम का निधन शाहिद कपूर-ईशान खट्टर की नानी खदीजा अजीम का शनिवार को निधन हो गया। खदीजा, एक्ट्रेस नीलिमा अजीम की मां थीं। वह एक स्वतंत्रता सेनानी, लेखिका और संपादक भी थीं। अपनी नानी के निधन से भावुक ईशान ने सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरों के एक साथ एक इमोशनल पोस्ट शेयर किया है।       |       उपमुख्यमंत्री सिसोदिया के पास कार नहीं      |      गणतंत्र दिवस पर राजभवन में सम्मानित होंगे शहीदों के परिजन      |       फेसबुक ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का नाम 'शिटहोल' लिखा      |      बीसीसीआई ने दो चयनकर्ताओं के लिए आवेदन मांगे, मुख्य चयनकर्ता एमसके प्रसाद और गगन खोड़ा का कार्यकाल खत्म      |       सारा की फिल्म 'लव आजकल' के ट्रेलर पर सैफ ने दिया रिएक्शन, कहा-'मेरी फिल्म का ट्रेलर ज्यादा अच्छा था'      |       भागवत ने कहा- जनसंख्या नियंत्रण को लेकर सरकार कदम उठाए      |      दावोस में वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम की वार्षिक बैठक में भाग लेंगे मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ      |      ईरान के विदेश मंत्री बोले- अगर भारत चाहे तो अमेरिका को हमारे साथ परमाणु समझौते में वापस आने के लिए मना सकता है      |      अंडर-19 वर्ल्ड कप आज से; 16 टीमें 48 मैच खेलेंगी      |       जजों के लिए अपशब्द बोलने पर हाईकोर्ट चीफ जस्टिस ने वकीलों पर दिए एफआईआर दर्ज करने के आदेश      |      सहिष्णुता की संस्कृति है भारत की पहचान - मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ      |      भाजपा के 57 प्रत्याशी घोषित      |       सीबीएसई की टेली काउंसलिंग 1 फरवरी से होगी शुरू      |      जयपुर के दर्शनीय स्थल      |      कॉन्ट्रेक्ट से बाहर होने के बाद MS Dhoni का BCCI को करारा जवाब      |      Sidharth Shukla की मां ने घर में की एंट्री, सबसे पहले Rashami Desai से मिली तो कहा ऐसा      |      17 जनवरी तक सभी स्‍कूलों में छुट्टी घोषित      |       हज के लिए 224 सीटें अधिक मिलीं, भोपाल में कल होगा कुर्रा      |      सुप्रीम कोर्ट ने टेलीकॉम कंपनियों की अर्जी खारिज की      |       जिला परिषद चुनाव: गडकरी-फडणवीस के घर नागपुर में भाजपा हारी      |      पाक आर्मी के प्रवक्ता ने दी दीपिका को शाबाशी      |       इंटरनेशनल क्रिकेट परिषद (आईसीसी) ने बुधवार को ताजा टेस्ट रैंकिंग जारी की। भारतीय कप्तान विराट कोहली 928 अंक के साथ शीर्ष पर बरकरार हैं।      |      बल्लेबाजों में कोहली, गेंदबाजों में कमिंस टॉप पर; बुमराह समेत 3 भारतीय बॉलर टॉप-10 में शामिल      |      कन्फेक्शनेरी क्लस्टर में अक्टूबर से शुरु हो उत्पादन : मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ      |      हिमाचल में 4 फीट तक बर्फ गिरी, शिमला में 43 पर्यटक बचाए गए      |      India vs Sri Lanka 2nd T20I Live Score: ओपनरों ने टीम इंड‍िया को दी तेज शुरुआत      |      बॉलीवुड एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण (Deepika Padukone) की 'छपाक' (Chapaak) इसी महीने 10 जनवरी को रिलीज होने वाली है. ऐसे में एक्ट्रेस इन दिनों फिल्म के प्रमोशन में काफी बिजी चल रही हैं. दीपिका पादुकोण ने 'छपाक' का प्रमोशन कई रिएलिटी शो में भी किया.       |      सभी जेलों और न्यायालयों में लगे वीडियो कान्फ्रेंसिंग उपकरण      |      मैदानी अनुभव से सरकार को लाभान्वित करें उद्योग और व्यवसाय      |      

आनंद की बात

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ज़मी ये हमारी वतन ये हमारा !देशभक्ति गीत!Bookmark and Share

देशभक्ति गीत
ज़मी ये हमारी वतन ये हमारा !
उजड़ने न पाए चमन ये हमारा !

ज़मीनों फलक ये जंहा के नज़ारे!
सभी कर रहे हैं अमन के इशारे !!
अमन चैन हो सारी दुनिया में कायिम!
ज़माने में हो हर तरफ भाई चारा !!

न मजहब सिखाता है तकरार बाँटो!
अगर बाँटना हो सदा प्यार बाँटो!!
वतन की हिफ़ाजत में ग़र जान जाए!
खुदरा यही फिर जनम दे दुबारा !

कंही है करपश्न कंही है घोटाले !
कोइ गांन्धी आए वतन को संभाले !!
न तन पे है कपडा न खाने को रोटी!
कोइ मुफलिसी मे फिरे मारा मारा !!

भगत बोष सुखदेव बलिदानियो को !
न भूलेंगे हम उनकी कुर्बानियो को !!
वो फांसी में भी चढ़ गए हँसते हँसते !
वतन के लिए हर सितम था गवारा !!

जय-जय-जय भारत प्यारा

खुशियों का यह देश है अपना,बढ़ता जाए रातों- दिन
ईद-दीवाली-क्रिशमश-लोहड़ी,हर दिन है खुशियों का दिन

भारत जैसा देश न दूजा,सब देशों से है न्यारा
हिन्दू-मुशलिम-सिख-ईसाई,बना रहे भाई चारा

देश प्रेम की भावना रखते, मंगल एकता जय कारा
संस्कारों का देश है अपना, जय-जय-जय भारत प्यारा

हिन्दुस्तां मेरा स्वर्ग धरा पर,वीरों का भारत सारा
नभ को चूमे पर्वत चोटी,बढ़ता जाए शिशिर पारा

मेघ दूत जब आज्ञा देते,बादल भर लाएँ जल खारा
हिमालय की गोद से बहती,शुद्ध जल गुणी-गंगा धारा

देश-द्रोही बने दुश्मन कोई,गिरफ्त में लें दुष्टों को मारा
डटा जो रक्षक सीमा परबल,भारत माँ की आँख का तारा

कौन कहता है ऊंचे पहाड़ों पर घास के मैदान नहीं होते

कौन कहता है

ऊंचे पहाड़ों पर घास के

मैदान नहीं होते

ऊंचे लोग धरातल से

जुड़े नहीं होते

हुए हैं इस देश में नेता

गाँधी,सुभाष,पटेल

जैसे भी

ना अहम् था,ना स्वार्थ था

ना ही खुद का ध्यान था

जीवित रहे जब तक

सोचते रहे देशवासियों के

भले के लिए

जिए जब तक जिए

देश और देशवासियों

के लिए

कर्तव्य की बलि वेदी पर

करी जान न्योछावर

देश और देशवासियों

के लिए

 

मेरा भारत प्यारा

फूल-फूल पर लिखा मिलेगा
मेरा भारत मुझको प्यारा.

कण-कण को जयघोष सुनाती
खिली हुई है हर फुलवारी
वीरों की यह पावन धरती
सबके लिए बनी हितकारी
तुम चाहो, सौरभ ले जाओ
दे दूँ मैं गुलदस्ता न्यारा.

यहाँ हवाएं घर-आँगन में
दिन भर आती-जाती रहतीं
आने वाले मेहमानों को
मीठा गीत सुनाती रहतीं
जाने वाला कह कर जाता
मैं लौटूंगा फिर दोबारा.

हंसी-ख़ुशी की हरियाली है
अमन-चैन की धूप सुहानी
हर मौसम में प्यार घुला है,
चिड़ियाँ कहतीं प्रेम की बानी.
सुनने वालों की आँखों में
झूला झूले गगन हमारा.

सात सुरों के लगते मेले
नित्य यहाँ पर साँझ-सवेरे
अगला जन्म यहीं प्रभु देना
यदि फिर हों जीवन के फेरे.
दो मीठे बोलों में बसता
अपना देश-प्रेम का नारा.

एक अच्छा देश

एक दिल्ली जो हम सब अपने साथ गांव से लाये
खाली कमरे के कोने में पड़ी हांफ रही है
खुरदरे फर्श पर एक काला रेडियो बोल रहा है
चंद काग़ज़ सादे
जिन पर हम लंबी कहानियां लिखेंगे
पीले बेरोज़गार दिनों के धब्बे बटोर रहे हैं

एक विचार तो ये भी है कि पहाड़ पर एक घर हो
और दिमाग़ में लंबी खामोशी
ये भी कुछ वैसा ही है
जैसे एक अच्छी नौकरी, ऊंचा ओहदा
उन लोगों के फार्म हाउस जैसा जिनका दिल्ली में भी अपना घर होता है!

गांव में चार कट्ठा ज़मीन है
एक टूटता हुआ पुराना घर
संदूक में रखे कुछ सुनहरे बर्तन सदियों की धूल में सने
सब कुछ जैसे एक भरोसा कि जेब भरी हुई है
लेकिन अच्छी खामखयाली गुलज़ार कहें तभी ठीक है
उनके पास हिंदी फिल्में हैं, एक बड़ा प्रकाशक है और डूबी हुई आवाज़ है

हम किरायेदार हैं दीवारों से झड़ती हैं परतें
सुबह पानी के खाली गिलास सी प्यासी, जलते कंठों की कूक में लिपटी हुई
अभी पूरा दिन पड़ा है
देह थकी सदियों सी बेजान
कुछ लोग कभी कोई काम नहीं कर पाते
हाथों की उन लकीरों की तरह जो बेजान होकर भी ज़िंदा दिखते हैं
उन कुछ लोगों के पीछे हम बहुत सारे रोज़ खड़े हो जाते हैं
और दिल्ली है एक छोटा सा दफ्तर
जहां सिफारिशें हैं, रिश्‍वत है, देह व्यापार है, दलाली है

हम सिर्फ कवि नहीं हो सकते
हम भी हो सकते हैं बेईमान
लेकिन वे बड़े बेईमान हमारी ख्वाहिशों से भी बहुत बड़े हैं

नाम अमर सिंह हुनर चतुराई धंधा राजकाज
खूब चमक रहा है सब कुछ
बेडौल खरबूज-सी देह पर सज रहे हैं चमकीले सूट
जीभ पर लपलपाते हुए षेर मीडिया की वाहवाही लूटते हैं

कमरे में बहुत पुरानी चादर मुड़ी-मुड़ी सी
लकड़ी की एक पुरानी कुर्सी
बरसों पुराना अंधेरा जाना पहचाना किसी उजास से नफ़रत करता

चाहतों के पंख होते हैं
प्रतिभा की दलील होती है

एक अच्छा सिनेमा उतनी ही बड़ी हसरत है जैसे मीना कुमारी
एक अच्छी कविता उतनी ही बड़ी हसरत है जैसे मुक्तिबोध
एक अच्छी कहानी उतनी ही बड़ी हसरत है जैसे प्रेमचंद
एक अच्छी राजनीति उतनी ही बड़ी हसरत है जैसे भगत सिंह

एक अच्छे देश को और अच्छा बनाने की हसरत अभी बाक़ी है
अभी तो ये दलालों के जबड़े में है!

जय अखंड भारत

शक्ति ऐसी है नहीं संसार में कोई कहीं पर, जो हमारे देश की राष्ट्रीयता को अस्त कर दे ।
ध्वान्त कोई है नहीं आकाश में ऐसा विरोधी, जो हमारी एकता के सूर्य को विध्वस्त कर दे !

राष्ट्र की सीमांत रेखाएँ नहीं हैं बालकों के खेल का कोई घरौंदा, पाँव से जिसको मिटा दे ।
देश की स्वाधीनता सीता सुरक्षित है, किसी दश-कंठ का साहस नहीं, ऊँगली कभी उसपर उठा दे ।

देश पूरा एक दिन हुंकार भी समवेत कर दे, तो सभी आतंकवादियों का बगुला टूट जाए ।
किन्तु, ऐसा शील भी क्या, देखता सहता रहे जो आततायी मातृ-मंदिर की धरोहर लूट जाए ।

रोग, पावक, पाप, रिपु प्रारंभ में लघु हों भले ही किन्तु, वे ही अंत में दुर्दम्य हो जाते उमड़कर ।
पूर्व इस भय के की वातावरण में विष फैल जाए, विषधरों के विष उगलते दंश को रख दो कुचलकर ।

झेलते तूफ़ान ऐसे सैकड़ो आए युगों से, हम इसे भी ऐतिहासिक भूमिका में झेल लेंगे ।
किन्तु, बर्बर और कायरता कलंकित कारनामों की पुनरावृति को निश्चेष्ट होकर हम सहेंगे ।

यह देश हमारा

यह देश हमारा
इस विश्व के गगन के सितारों का सितारा
ये देश हमारा

ये विंध्य ये हिमालय
गंगोजमन कहाँ
ऐसी धरा कहाँ है
ऐसा गगन कहाँ
कुदरत ने जैसे धरती पर स्वर्ग उतारा
ये देश हमारा

सोने के दिन हैं इसके
चाँदी की रात है
हीरों की फ़सल होती
इसकी क्या बात है
इस देश में ही पाएँ हम जन्म दोबारा
ये देश हमारा

दुनिया के अंधेरों को
यहीं पर किरण मिली
घायल मनुष्यता को
यहीं पर शरण मिली
ये शांति प्रेम उन्नति की मुक्त त्रिधारा
ये देश हमार

अँखियों को रहने दो, अँखियों के आस पास

टूटके दिल के टुकड़े टुकड़े हो गए मेरे सीने में
आ गले लगके मर जाएं, क्या रखा है जीने में

अँखियों को रहने दे, अँखियों के आस पास
दूर से दिल की बुझती रहे प्यास

दर्द ज़माने में कम नहीं मिलते
सब को मोहब्बत से ग़म नहीं मिलते
टूटने वाले दिल होते हैं कुछ खास
दूर से दिल की बुझती रहे प्यास

रह गई दुनिया में नाम की खुशियाँ
तेरे मेरे किस काम की खुशियाँ
सारी उम्र हमको रहन है यूँ उदास
दूर से दिल की बुझती रहे प्यास

पैग़ाम

चलो पैग़ाम दे अहले वतन को
कि हम शादाब रक्खें इस चमन को
न हम रुसवा करें गंगों -जमन को
करें माहौल पैदा दोस्ती का
यही मक़सद बना लें ज़िन्दगी का

कसम खायें चलो अम्नो अमाँ की
बढ़ायें आबो-ताब इस गुलसिताँ की
हम ही तक़दीर हैं हिन्दोस्ताँ की
हुनर हमने दिया है सरवरी का
यही मक़सद बना लें ज़िन्दगी का

ज़रा सोचे कि अब गुजरात क्यूँ हो
कोई धोखा किसी के साथ क्यूँ हो
उजालों की कभी भी मात क्यूँ हो
तराशे जिस्म फिर से रौशनी का
यही मक़सद बना लें ज़िन्दगी का

न अक्षरधाम, दिल्ली, मालेगाँव
न दहशत गर्दी अब फैलाए पाँव
वतन में प्यार की हो ठंडी छाँव
न हो दुश्मन यहाँ कोई किसी का
यही मक़सद बना लें ज़िन्दगी का

हवाएँ सर्द हों कश्मीर की अब
न तलवारों की और शमशीर की अब
ज़रूरत है ज़़बाने -मीर की अब
तक़ाज़ा भी यही है शायरी का
यही मक़सद बना लें ज़िन्दगी का

मुहब्बत का जहाँ आबाद रक्खें
न कड़वाहट को हरगिज़ याद रक्खें
नये रिश्तों की हम बुनियाद रक्खें
बढ़ायें हाथ हम सब दोस्ती का
यही मक़सद बना लें ज़िन्दगी का
यही मक़सद बना लें ज़िन्दगी का
जय हिंद

मेरे देश की तरह

स्वतन्त्र हुए
देश की तरह था
वह-
उसका माथा
उसकी हँसी-

मेरे देश की तरह
दिव्य,
अविभाज्य
और
सम्पूर्ण ।

हमारा देश

इन्हीं तृण-फूस-छप्पर से
ढंके ढुलमुल गँवारू
झोंपड़ों में ही हमारा देश बसता है

इन्हीं के ढोल-मादल-बाँसुरी के
उमगते सुर में
हमारी साधना का रस बरसता है
इन्हीं के मर्म को अनजान
शहरों की ढँकी लोलुप
विषैली वासना का साँप डँसता है

इन्हीं में लहरती अल्हड़
अयानी संस्कृति की दुर्दशा पर
सभ्यता का भूत हँसता है।

आह ! वेदना मिली विदाई

आह ! वेदना मिली विदाई
मैंने भ्रमवश जीवन संचित,
मधुकरियों की भीख लुटाई

छलछल थे संध्या के श्रमकण
आँसू-से गिरते थे प्रतिक्षण
मेरी यात्रा पर लेती थी
नीरवता अनंत अँगड़ाई

श्रमित स्वप्न की मधुमाया में
गहन-विपिन की तरु छाया में
पथिक उनींदी श्रुति में किसने
यह विहाग की तान उठाई

लगी सतृष्ण दीठ थी सबकी
रही बचाए फिरती कब की
मेरी आशा आह ! बावली
तूने खो दी सकल कमाई

चढ़कर मेरे जीवन-रथ पर
प्रलय चल रहा अपने पथ पर
मैंने निज दुर्बल पद-बल पर
उससे हारी-होड़ लगाई

लौटा लो यह अपनी थाती
मेरी करुणा हा-हा खाती
विश्व ! न सँभलेगी यह मुझसे
इसने मन की लाज गँवाई

अरुण यह मधुमय देश हमारा

अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।।
सरल तामरस गर्भ विभा पर, नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर, मंगल कुंकुम सारा।।
लघु सुरधनु से पंख पसारे, शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किए, समझ नीड़ निज प्यारा।।
बरसाती आँखों के बादल, बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकरातीं अनन्त की, पाकर जहाँ किनारा।।
हेम कुम्भ ले उषा सवेरे, भरती ढुलकाती सुख मेरे।
मंदिर ऊँघते रहते जब, जगकर रजनी भर तारा।।

मातृभूमि

नीलांबर परिधान हरित तट पर सुन्दर है।
सूर्य-चन्द्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर है॥
नदियाँ प्रेम प्रवाह, फूल तारे मंडन हैं।
बंदीजन खग-वृन्द, शेषफन सिंहासन है॥

करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेष की।
हे मातृभूमि! तू सत्य ही, सगुण मूर्ति सर्वेश की॥

जिसके रज में लोट-लोट कर बड़े हुये हैं।
घुटनों के बल सरक-सरक कर खड़े हुये हैं॥
परमहंस सम बाल्यकाल में सब सुख पाये।
जिसके कारण धूल भरे हीरे कहलाये॥

हम खेले-कूदे हर्षयुत, जिसकी प्यारी गोद में।
हे मातृभूमि! तुझको निरख, मग्न क्यों न हों मोद में?

पा कर तुझसे सभी सुखों को हमने भोगा।
तेरा प्रत्युपकार कभी क्या हमसे होगा?
तेरी ही यह देह, तुझी से बनी हुई है।
बस तेरे ही सुरस-सार से सनी हुई है॥

फिर अन्त समय तू ही इसे अचल देख अपनायेगी।
हे मातृभूमि! यह अन्त में तुझमें ही मिल जायेगी॥

निर्मल तेरा नीर अमृत के से उत्तम है।
शीतल मंद सुगंध पवन हर लेता श्रम है॥
षट्ऋतुओं का विविध दृश्ययुत अद्भुत क्रम है।
हरियाली का फर्श नहीं मखमल से कम है॥

शुचि-सुधा सींचता रात में, तुझ पर चन्द्रप्रकाश है।
हे मातृभूमि! दिन में तरणि, करता तम का नाश है॥

सुरभित, सुन्दर, सुखद, सुमन तुझ पर खिलते हैं।
भाँति-भाँति के सरस, सुधोपम फल मिलते है॥
औषधियाँ हैं प्राप्त एक से एक निराली।
खानें शोभित कहीं धातु वर रत्नों वाली॥

जो आवश्यक होते हमें, मिलते सभी पदार्थ हैं।
हे मातृभूमि! वसुधा, धरा, तेरे नाम यथार्थ हैं॥

क्षमामयी, तू दयामयी है, क्षेममयी है।
सुधामयी, वात्सल्यमयी, तू प्रेममयी है॥
विभवशालिनी, विश्वपालिनी, दुःखहर्त्री है।
भय निवारिणी, शान्तिकारिणी, सुखकर्त्री है॥

हे शरणदायिनी देवि, तू करती सब का त्राण है।
हे मातृभूमि! सन्तान हम, तू जननी, तू प्राण है॥

जिस पृथ्वी में मिले हमारे पूर्वज प्यारे।
उससे हे भगवान! कभी हम रहें न न्यारे॥
लोट-लोट कर वहीं हृदय को शान्त करेंगे।
उसमें मिलते समय मृत्यु से नहीं डरेंगे॥

उस मातृभूमि की धूल में, जब पूरे सन जायेंगे।
होकर भव-बन्धन- मुक्त हम, आत्म रूप बन जायेंगे॥

भारत माता का मंदिर यह

भारत माता का मंदिर यह
समता का संवाद जहाँ,
सबका शिव कल्याण यहाँ है
पावें सभी प्रसाद यहाँ ।

जाति-धर्म या संप्रदाय का,
नहीं भेद-व्यवधान यहाँ,
सबका स्वागत, सबका आदर
सबका सम सम्मान यहाँ ।
राम, रहीम, बुद्ध, ईसा का,
सुलभ एक सा ध्यान यहाँ,
भिन्न-भिन्न भव संस्कृतियों के
गुण गौरव का ज्ञान यहाँ ।

नहीं चाहिए बुद्धि बैर की
भला प्रेम का उन्माद यहाँ
सबका शिव कल्याण यहाँ है,
पावें सभी प्रसाद यहाँ ।

सब तीर्थों का एक तीर्थ यह
ह्रदय पवित्र बना लें हम
आओ यहाँ अजातशत्रु बन,
सबको मित्र बना लें हम ।
रेखाएँ प्रस्तुत हैं, अपने
मन के चित्र बना लें हम ।
सौ-सौ आदर्शों को लेकर
एक चरित्र बना लें हम ।

बैठो माता के आँगन में
नाता भाई-बहन का
समझे उसकी प्रसव वेदना
वही लाल है माई का
एक साथ मिल बाँट लो
अपना हर्ष विषाद यहाँ
सबका शिव कल्याण यहाँ है
पावें सभी प्रसाद यहाँ ।

मिला सेव्य का हमें पुज़ारी
सकल काम उस न्यायी का
मुक्ति लाभ कर्तव्य यहाँ है
एक एक अनुयायी का
कोटि-कोटि कंठों से मिलकर
उठे एक जयनाद यहाँ
सबका शिव कल्याण यहाँ है
पावें सभी प्रसाद यहाँ ।

जय राष्ट्रीय निशान

जय राष्ट्रीय निशान!
जय राष्ट्रीय निशान!!!
लहर लहर तू मलय पवन में,
फहर फहर तू नील गगन में,
छहर छहर जग के आंगन में,
सबसे उच्च महान!
सबसे उच्च महान!
जय राष्ट्रीय निशान!!
जब तक एक रक्त कण तन में,

डिगे न तिल भर अपने प्रण में,हाहाकार मचावें रण में,
जननी की संतान
जय राष्ट्रीय निशान!
मस्तक पर शोभित हो रोली,
बढे शुरवीरों की टोली,
खेलें आज मरण की होली,
बूढे और जवान
बूढे और जवान!
जय राष्ट्रीय निशान!
मन में दीन-दुःखी की ममता,
हममें हो मरने की क्षमता,
मानव मानव में हो समता,
धनी गरीब समान
गूंजे नभ में तान
जय राष्ट्रीय निशान!
तेरा मेरा मेरुदंड हो कर में,
स्वतन्त्रता के महासमर में,
वज्र शक्ति बन व्यापे उस में,
दे दें जीवन-प्राण!
दे दें जीवन प्राण!
जय राष्ट्रीय निशान!!

 

 

कवि वही

कवि वही जो अकथनीय कहे
किंतु सारी मुखरता के बीच मौन रहे
शब्द गूँथे स्वयं अपने गूथने पर
कभी रीझे कभी खीझे कभी बोल सहे
कवि वही जो अकथनीय कहे

सिद्ध हो जिसको मनोमय मुक्ति का सौंदर्य साधन
भाव झंकृति रूप जिसका अलंकृति जिसका प्रसाधन
सिर्फ़ अपना ही नहीं सबका ताप जिसे दहे
रूष्ट हो तो जगा दे आक्रोश नभ का
द्रवित हो तो सृष्टि सारी साथ-साथ बहे।

शक्ति के संचार से
या अर्थ के संभार से
प्रबल झंझावात से
या घात-प्रत्याघात से
जहां थकने लगे वाणी स्वयं हाथ गहे।

शांति मन में क्रांति का संकल्प लेकर टिकी हो
कहीं भी गिरवी न हो ईमान जिसका
कहीं भी प्रज्ञा न जिसकी बिकी हो
जो निरंतर नयी रचना-धर्मिता से रहे पूरित
लेखनी जिसकी कलुष में डूब कर भी
विशद उज्जवल कीर्ति लाभ लहे
कवि वही जो अकथनीय कहे

स्वतंत्रता का दीपक

घोर अंधकार हो, चल रही बयार हो,
आज द्वार द्वार पर यह दिया बुझे नहीं।
यह निशीथ का दिया ला रहा विहान है।

शक्ति का दिया हुआ, शक्ति को दिया हुआ,
भक्ति से दिया हुआ, यह स्वतंत्रतादिया,
रुक रही न नाव हो, ज़ोर का बहाव हो,
आज गंगधार पर यह दिया बुझे नहीं!
यह स्वदेश का दिया प्राण के समान है!

यह अतीत कल्पना, यह विनीत प्रार्थना,
यह पुनीत भावना, यह अनंत साधना,
शांति हो, अशांति हो, युद्ध, संधि क्रांति हो,
तीर पर, कछार पर, यह दिया बुझे नहीं!
देश पर, समाज पर, ज्योति का वितान है!

तीनचार फूल है, आसपास धूल है
बाँस है, बबूल है, घास के दुकूल है,
वायु भी हिलोर से, फूँक दे, झकोर दे,
कब्र पर, मजार पर, यह दिया बुझे नहीं!
यह किसी शहीद का पुण्य प्राणदान है!

झूमझूम बदलियाँ, चूमचूम बिजलियाँ
आँधियाँ उठा रहीं, हलचलें मचा रहीं!
लड़ रहा स्वदेश हो, शांति का न लेश हो
क्षुद्र जीतहार पर, यह दिया बुझे नहीं! यह स्वतंत्र भावना का स्वतंत्र गान है!

- गोपालसिंह नेपाली

बढ़े चलो, बढ़े चलो

न हाथ एक शस्त्र हो,
न हाथ एक अस्त्र हो,
न अन्न वीर वस्त्र हो,
हटो नहीं, डरो नहीं,
बढ़े चलो, बढ़े चलो

रहे समक्ष हिम-शिखर,
तुम्हारा प्रण उठे निखर,
भले ही जाए जन बिखर,
रुको नहीं, झुको नहीं,
बढ़े चलो, बढ़े चलो

घटा घिरी अटूट हो,
अधर में कालकूट हो,
वही सुधा का घूंट हो,
जिये चलो, मरे चलो,
बढ़े चलो, बढ़े चलो

गगन उगलता आग हो,
छिड़ा मरण का राग हो,
लहू का अपने फाग हो,
अड़ो वहीं, गड़ो वहीं,
बढ़े चलो, बढ़े चलो

चलो नई मिसाल हो,
जलो नई मिसाल हो,
बढो़ नया कमाल हो,
झुको नही, रूको नही,
बढ़े चलो, बढ़े चलो

अशेष रक्त तोल दो,
स्वतंत्रता का मोल दो,
कड़ी युगों की खोल दो,
डरो नही, मरो नहीं,
बढ़े चलो, बढ़े चलो

वीर तुम बढ़े चलो धीर तुम बढ़े चलो

वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो

साथ में ध्वजा रहे
बाल दल सजा रहे
ध्वज कभी झुके नहीं
दल कभी रुके नहीं

सामने पहाड़ हो
सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर,हटो नहीं
तुम निडर,डटो वहीं

वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो

प्रात हो कि रात हो
संग हो न साथ हो
सूर्य से बढ़े चलो
चन्द्र से बढ़े चलो

वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो

इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है

इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है।
देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से
सिंचित करो धरा, समता की भाव वृष्टि से
जाति भेद की, धर्म-वेश की
काले गोरे रंग-द्वेष की
ज्वालाओं से जलते जग में
इतने शीतल बहो कि जितना मलय पवन है॥

नये हाथ से, वर्तमान का रूप सँवारो
नयी तूलिका से चित्रों के रंग उभारो
नये राग को नूतन स्वर दो
भाषा को नूतन अक्षर दो
युग की नयी मूर्ति-रचना में
इतने मौलिक बनो कि जितना स्वयं सृजन है॥

लो अतीत से उतना ही जितना पोषक है
जीर्ण-शीर्ण का मोह मृत्यु का ही द्योतक है
तोड़ो बन्धन, रुके न चिंतन
गति, जीवन का सत्य चिरन्तन
धारा के शाश्वत प्रवाह में
इतने गतिमय बनो कि जितना परिवर्तन है।

चाह रहे हम इस धरती को स्वर्ग बनाना
अगर कहीं हो स्वर्ग, उसे धरती पर लाना
सूरज, चाँद, चाँदनी, तारे
सब हैं प्रतिपल साथ हमारे
दो कुरूप को रूप सलोना
इतने सुन्दर बनो कि जितना आकर्षण है

कदम कदम बढ़ाये जा

कदम कदम बढ़ाये जा
खुशी के गीत गाये जा
ये जिंदगी है क़ौम की
तू क़ौम पे लुटाये जा

तू शेर-ए-हिन्द आगे बढ़
मरने से तू कभी न डर
उड़ा के दुश्मनों का सर
जोश-ए-वतन बढ़ाये जा

कदम कदम बढ़ाये जा
खुशी के गीत गाये जा
ये जिंदगी है क़ौम की
तू क़ौम पे लुटाये जा

हिम्मत तेरी बढ़ती रहे
खुदा तेरी सुनता रहे
जो सामने तेरे खड़े
तू खाक में मिलाये जा

कदम कदम बढ़ाये जा
खुशी के गीत गाये जा
ये जिंदगी है क़ौम की
तू क़ौम पे लुटाये जा

चलो दिल्ली पुकार के
ग़म-ए-निशाँ संभाल के
लाल क़िले पे गाड़ के
लहराये जा लहराये जा

कदम कदम बढ़ाये जा
खुशी के गीत गाये जा
ये जिंदगी है क़ौम की
तू क़ौम पे लुटाये जा

किसको नमन करूँ मैं भारत?

तुझको या तेरे नदीश, गिरि, वन को नमन करूँ, मैं ?
मेरे प्यारे देश ! देह या मन को नमन करूँ मैं ?
किसको नमन करूँ मैं भारत ? किसको नमन करूँ मैं ?

भू के मानचित्र पर अंकित त्रिभुज, यही क्या तू है ?
नर के नभश्चरण की दृढ़ कल्पना नहीं क्या तू है ?
भेदों का ज्ञाता, निगूढ़ताओं का चिर ज्ञानी है
मेरे प्यारे देश ! नहीं तू पत्थर है, पानी है
जड़ताओं में छिपे किसी चेतन को नमन करूँ मैं ?

भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेष नर का है
एक देश का नहीं, शील यह भूमंडल भर का है
जहाँ कहीं एकता अखंडित, जहाँ प्रेम का स्वर है
देश-देश में वहाँ खड़ा भारत जीवित भास्कर है
निखिल विश्व को जन्मभूमि-वंदन को नमन करूँ मैं !

खंडित है यह मही शैल से, सरिता से सागर से
पर, जब भी दो हाथ निकल मिलते आ द्वीपांतर से
तब खाई को पाट शून्य में महामोद मचता है
दो द्वीपों के बीच सेतु यह भारत ही रचता है
मंगलमय यह महासेतु-बंधन को नमन करूँ मैं !

दो हृदय के तार जहाँ भी जो जन जोड़ रहे हैं
मित्र-भाव की ओर विश्व की गति को मोड़ रहे हैं
घोल रहे हैं जो जीवन-सरिता में प्रेम-रसायन
खोर रहे हैं देश-देश के बीच मुँदे वातायन
आत्मबंधु कहकर ऐसे जन-जन को नमन करूँ मैं !

उठे जहाँ भी घोष शांति का, भारत, स्वर तेरा है
धर्म-दीप हो जिसके भी कर में वह नर तेरा है
तेरा है वह वीर, सत्य पर जो अड़ने आता है
किसी न्याय के लिए प्राण अर्पित करने जाता है
मानवता के इस ललाट-वंदन को नमन करूँ मैं !

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है ।

करता नहीं क्यों दुसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफिल मैं है ।

रहबर राहे मौहब्बत रह न जाना राह में
लज्जत-ऐ-सेहरा नवर्दी दूरिये-मंजिल में है ।

यों खड़ा मौकतल में कातिल कह रहा है बार-बार
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है ।

ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार
अब तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफिल में है ।

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है ।

खींच कर लाई है सब को कत्ल होने की उम्मींद,
आशिकों का जमघट आज कूंचे-ऐ-कातिल में है ।

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है ।
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रहबर – Guide
लज्जत – tasteful
नवर्दी – Battle
मौकतल – Place Where Executions Take Place, Place of Killing
मिल्लत – Nation, faith